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चांद सा ।🌙

मेरे अपने अनुभव

वो सबसे जुदा था ,
जो खुद पे फिदा था ।
खुदी में ही उसके
उसका खुदा था ।

स्वयं एक रौनक था,
ऋषि जैसे शौनक था।
वो करता मनमानी था,
मगर एक ज्ञानी था।

जहाँ भी वो जाता था,
मौसम ले आता था ।
गरम हवाओं में ,
बादल सा छाता था ।

वो जब भी गाता था,
मन को लुभाता था ।
रोता हुआ था जो,
उसको हँसाता था ।

उसकी वो कलाएं
थीं सब को लुभाए ।
मुसीबत में पहुंचे
जहां जो बुलाएं।

अमावस का दिन था,
वो कुछ अलविदा सा।
हुआ एक दिन गुम
वो इक बुदबुदा सा। ✍️

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