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महामारी और लाचारी

Shabd Jaal

लाशें जलती हैं बेतहाशा ।

सांसे थमती हैं , घुटती हैं ।

और हर पल खोती है आशा ।

उम्मीद किसने चाहा नहीं ?

दुआ किसने मांगी नहीं ?

वक्त मुकर्रर होता है माना ।

पर कबूल नहीं , यूँ अधुरा सब छोड़ जाना।

जो जग सकते थे उनका बेवक्त सो जाना ।

दूर बिलखते अपने और उनका बंद थैलीयों में खो जाना।

मजबूरी है कैसी, की छू नहीं सकते ,

आखिरी वक्त भी गलेे लग रो नहीं सकते।

वो बच सकते थे ,

वो बच सकते थे,

गर सुदृढ़ सुविधा होती ।

बिमारी होती भी , पर लाचारी की दुविधा ना होती ।

जब गुजरेगा ये सब,

तो बचे लोग संभालेंगे अपनी अंतर्दशा

क्योंकि जो हो रहा है, मुश्किल हीं से जायेगी इसकी व्यथा ।

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