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आँखे देखें सब सत्य…

Ashish Vision

आँखे देखें सब सत्य , पर मन मैला हो जाये।
इस मलीन मन को अब , कौन कैसे जलाये ?

ज़िन्दगी के समर में , आग उगलता इंसान।
इस आग में आखिर जल रहा , सिर्फ और सिर्फ इंसान।
शून्य हुआ संसार , मानव के बाजार में।
मिट रही मानवता , मानव निर्मित संसार में।
थम गयी है ज़िन्दगी , आज के इस दौर में।
सांसे रूकती जा रही , इस प्रदूषित अंधकार में।
सत्य स्वीकार्य नहीं , इस दूषित समाज में।
सब खुद ही सत्य हैं , इस अनोखे दौर में।
सब कुछ पाया हमने , इस भौतिक दुनिया में।
खोया तो सिर्फ इंसानियत , इंसानो की दुनिया में।
हंसी , ख़ुशी और अपनापन , सब लिप्त हो रही।
संघर्ष के इस काल में , आँखें मूँद हो रही।

फिर भी हम हैं आज , खुद को कुछ बदलना होगा।
इस नयी चुनौती से , अब मिलकर निपटना होगा।

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