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Poem by Shamin Reza / Translated into Hindi by Pankhuri Sinha

ATUNIS GALAXY POETRY

 
Poem by Shamin Reza
 
 
पोरानी और नदी बोधूसारा
 
पोरानी, कृपा करो, चली आओ उस नोक्षिकान्था से बाहर, बाहर उस पुरातन चादर से
 
मैं नील कंठ शिव प्रेम में हूँ, दग्ध है मेरा कंठ ज़हर से, पत्थर के उस महल ने थका दिया है मुझे–
 
मेरे भीतर रहती है कौन सी प्रेयसी, क्या देखा है कभी मैंने उसे?
मैं केवल चलता गया हूँ
मथुरा की ज़मीन पर
शायद उसके साथ
जो रहती है मेरे भीतर!
 
पोरानी, ओ उस प्रचीनतम समय
उस नौक्षीकान्था की लड़की!
वो अब जुटते नहीं
प्रांगण में पूजा के
आओ कृपा कर, देखो मेरे ह्रदय का तूफान !
मैं आँधी में फंसा हूँ !
मेरी प्रियतमा को मिल गया है
अपना साथी।
एक छाया में छिप गई है
धूप की कराह!
मेरी आँखो में जल रही है
एक अंगीठी!
निद्रा विहीन रातें मंडराती हैं
हर कहीं, और तुम सो रही हो

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